Tuesday, 18 September 2018

ये कैसी नफ़रत !

नफरत के रिश्ता निभाना सबसे आसान है। इसके लिए कोई बहुत बड़ी वजह का होना जरुरी नहीं है। एक छोटी सी वजह भी काफी गहरे नफ़रत को पैदा कर सकती है।
 कहते हैं दुनिया में सबसे ज्यादा चालाक प्राणी इंसान है, मेरे हिसाब से सबसे ज्यादा बेवकूफ भी इंसान ही है क्योंकि हमें सब कुछ पता रहते हुए भी जानबूझकर गलत रास्ते पर चलते हैं, हमें पता है इससे हमें नुकसान होगा लेकिन फिर भी हम वहीं काम करते हैं।
नफरत की इजात इंसानो ने ही किया है। सबसे बड़े ताज्जुब की बात ये है कि एक इंसान को दूसरे इंसान से नफरत हो जाती है। ऐसी नफ़रत जो एक भाई का भाई से, दोस्त का दोस्त से, किसी के प्यार का रिश्ता पल भर में खत्म कर देती है।
हम इंसान भी किसी से प्यार करने की एक छोटी वजह को नहीं ढूढ़ते हैं। हमारा दिमाग सेट होता है एक छोटी सी कमी को ढूढने में, जिससे हमें नफ़रत होने लगती है।
 अगर कोई हम पर हसेे तो नफरत, नजरअंदाज करे तो नफरत, कम प्यार करे तो नफरत, नफरत करे तो नफरत, ऐसी क्यों है ये नफ़रत?
 काश इस दुनिया के पेड़ पौधे भी नफरत करना सीख जाते तो हाल कुछ ऐसा होता कि एक ही पेड़ किसी को मीठा फल देता तो किसी को कड़वा।
कुछ लोगों के लिए पेड़ छांव देते तो किसी को नहीं। दूध देने वाला पशु भी कुछ के लिए दूध देते और जिनसे नफरत होती उन्हें गोबर।
आसमान का सूरज भी सिर्फ कुछ लोगों को धूप देता ।काश ऐसा होता यह सब भी नफरत करना सीख जाते।
इस दुनिया में नफरत करने की हजारों वजह है कोई काला है तो नफ़रत, कोई बहुत छोटा है तो नफरत, कोई मोटा है तो नफरत, कोई हसता है तो नफ़रत, किसी की जिंदगी जीने के तौर तरीकों से नफरत, तो किसी की मजहब से नफरत।
आजकल बचपन से ही छोटे बच्चों को नफरत का पाठ पढ़ाया जाता है ।बेवजह की नफरत को ना जाने लोग प्यार से भी जादा तवज्जो क्यों देते हैं।
 कुछ दिनों पहले की बात है मैं एक जगह बैठा हुआ था
और भी बहुत से लोग थे ,साथ में।  तभी उनमें से एक ने दूसरे की तरफ इशारा करते हुए कहा, "मुझे तुम्हारे इस कपड़े की रंग से नफरत है। मेरे सामने से हटाओ। मुझे हरे रंग से एकदम नफरत है। चिढ़ हो जाती है, जब मैं कभी हरे रंग को देखता हूं।" वहां पर बैठे हुए लोगों ने उससे ये तक नहीं पूछा आखिर तुम्हें क्यों हरे रंग से चिढ़ है। मैं पूछना चाहता था लेकिन पूछ ना सका। मेरी जेहन में यह बात आज भी ढेरो सवाल करती है। मैं पूछता हूं आखिर तुम्हें क्यों हरे रंग से नफरत है महज वो तो सिर्फ़ एक कपड़े पर चढ़ा हुआ रंग ही तो है। और तुम्हें किस हरे रंग से नफरत हो रही है? वो, जो हमारे देश की तिरंगे में हैं, या फिर इस धरती के पेड़ पौधों के हरे रंग से नफ़रत हो रही है जो ये हरा ना रहे तो शायद इंसानों का नामो निशान ना हो इस धरती पर। आखिर तुमको किस हरे रंग से नफ़रत हो रही है? तुम्हारा हरा रंग, किस रंग का है?
ये कैसी बेतुकी सी नफ़रत है। मै तो कहता हूं नफ़रत करनी है तो अपनी इन आखों से करो जो तुम्हे हरा और लाल में फरक दिखाती है। ये ना होती तो ये नफ़रत ना होती और हर रंग एक सा लगता।
     
                             -Kritesh Verma




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Saturday, 15 September 2018

Ye Jo Zindagi hai !


कैरियर बनाने के चक्कर में हम कितना वक्त लगाते है? कब हमे ऐसा लगता है, हा अब हमारी लाइफ सेट हो गई है।
इसकी शुरुआत होती है हमारे पैदा होने के कुछ महीने बाद, अपने ही घर से। बोलो बेटा! A....B.......C......।
यहां से सुरु होती है ये घटना। अभी हम ठीक से खड़े भी नहीं हो पाते लेकिन हमारे लिए एक बडी सी इमारत खड़ा कर दिया जाता है कैरियर का।
अभी कुछ दिन ही हुए होते है पैर जमीन पर रखे हुए तभी हमारे पैरो को जमीन से उठाकर काले रंग के जूतों में डाल दिए जाते हैं , और हमे ज्ञान के उस जेल में डाल दिया जाता है, जहा हम हर रोज कैद होते है और हर रोज हमे बेल मिलती है, यानी कि स्कूल !
लोग कहते है यहां बच्चे सुधरते हैं। लोग ये भी कहते है कि जेल में लोग सुधरते है।  एक छोटे से बच्चे के लिए इन दोनों बातों में कुछ ज्यादा फर्क नहीं होता है। उसके मन में एक ही सवाल आता है कि हमने आखिर ऐसी कौन सी गुनाह किया जों हमे स्कूल में डाल दिया गया।
"पहले कुछ ठीक था,
कुछ वक़्त मिलता था बिना किताबों के बोझ के तले बचपन जीने का।
लेकिन अब कहा ये हक  किसी बच्चे के पास बचपन जीने का ।"


तो ऐसे ही सुरु होती है स्कूल से कैरियर बनाने के रेस। 15 साल के कड़ी मेहनत  बाद हमें स्कूल से राहत मिलती है, और फिर शुरू होता है कॉलेज लाइफ ........................
बिंदास, झकास, वाह लाइफ हो तो ऐसी ! कुछ ऐसा ही लगता है कॉलेज के पहला और दूसरा साल। फिर आता है हमरी लाइफ का फाइनल ईयर। फिर याद आती है कैरियर की उस इमारत की जो हमारे दिमाग में कई सालो से बनती चली आ रही है। अब उसी इमारत के दायरे में रहना है और उसके रूल्स , रेगुलेशन फॉलो करना है। तभी हम उसे हासिल कर पाएंगे।
आखिर में 3 या 4 साल बाद कॉलेज का चैप्टर ख़तम हो जाता हैं। अब लगभग हमरी ऐज 22 या 33 तक हो जाती है।
अब जहा हमारा मेन फोकस होता है कैरियर, सक्सेस होना। वहीं दूसरी तरफ घरवालों का हमरी शादी।
आज कल ऐसा कम ही होता है कि कॉलेज ख़तम होने के साथ ही किसी को जॉब मिल जाए। कभी कभार एक या दो लोगो को मिल भी जाता है। इस लिए इन लोगो को अपवाद कहा गया है, और ऐसे लोगो को सक्सेस की periodic table से निकाल कर अलग अपवाद में रखा गया है। ऐसे लोगो की तकदीर और हुनर इनके व्यक्तितव से मेल नहीं खाती हैं।
अब कम से कम 2 या 3 या उससे भी ज्यादा वक़्त लग जाता है सक्सेस की उस चाभी को ढूढने में जो हमने अपने  सपने में छुपा दिया है।
आखिरकार तीन या चार साल की लंबी स्ट्रगल  के बाद सक्सेस मिलती है। तब जाकर लोग कहते हैं "तू आदमी बन गया" । अरे यार! अब तक क्या थे हम?
हमको मिल जाती है मनपसंद जॉब।
अब हमरी उमर हो जाती है 26 या 27। अब बस पैसे कमा कर लाइफ सेट करनी होती है। अगर पढ़ाई में कहीं से लोन लिया हो, बैंक से या कोई रिलेटिव से या कुछ और
तो उसे चुकता करते है।  एक अच्छा घर , एक कार , जरूरत की सामान्य चीज़े सेट करने में लग जाते है करीब चार से पाच साल ।
इसी बीच ज़िन्दगी के Question paper  की  उस प्रश्ऩ  को करना पड़ता है जिनके ऊपर मोटे हेडिंग में लिखा होता है" यह प्रश्ऩ अनिवार्य है"। मेरे कहने का मतलब शादी !
अब ऐसा लगता है ज़िन्दगी के सामान्य जरूरत की चीजें पूरी हो चुकी हैं।  अब हमे उस बात का खयाल आता है जब हमारे मौज , मस्ती करते वक़्त लोग कहते थे " मौज मस्ती करने के लिए पूरी लाइफ पड़ी है"।
हम हम सोचते है कहीं अच्छी जगह घूमने,
मौज मस्ती करने चलते है। और तब हम सब कुछ प्लान करने लगते है ट्रिप और वैकेशन के बारे में। तब हम ट्रिप की टिकट करवाने जाते है।
ज़िन्दगी को सेटल करते करते हम शायद एक उमर आकर बैठ जाते है तब हमारे जेहन में एक बड़ा Confusion हो जाता है, शायद बहुत बड़ा Confusion की " टिकट गोवा की करवाए या हरिद्वार की ?"..........
                                          
                                       -Kritesh Verma






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ये कैसी नफ़रत !

नफरत के रिश्ता निभाना सबसे आसान है। इसके लिए कोई बहुत बड़ी वजह का होना जरुरी नहीं है। एक छोटी सी वजह भी काफी गहरे नफ़रत को पैदा कर सकती है।...